कविता: ना किसी की आस कर
- Gajendra G.
- 2 days ago
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एक लंबी तू श्वास भर,
और मुझ पर तू विश्वास कर।
बढ़ा कदम और रख धरा पर,
ना किसी की आस कर।
क्यों बन रहा तू दास भर?
ना दुनिया को बर्दाश्त कर।
जा, चूम अम्बर के शिखर को,
ना किसी की आस कर।
अश्रुओं का नाश कर,
शोक का तू हास कर।
अब जीत का आगाज़ कर,
ना किसी की आस कर।
वीरों के आवास पर,
आकाश के विस्तार पर,
है तेरा अब इंतज़ार भर,
ना किसी की आस कर।
- गजेन्द्र
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