कविता: किसी उलझन को सुलझाऊँ
- Gajendra G.
- Mar 8
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किसी उलझन को सुलझाऊँ,
किसी छाँव के नीचे,
जहाँ धूप पहुँच न सके,
जीवन की उम्मीद न घटे।
वहाँ बैठ मैं जीवन की
किसी उलझन को सुलझाऊँ।
जहाँ मंज़िल न हो,
न हो कोई मुसाफ़िर,
हो तो केवल मेरा अहसास,
उस राह को पाने की चाह में
किसी उलझन को सुलझाऊँ।
हर प्रश्न बने जीवन,
और उत्तर हो केवल तुम।
न लगाव किसी विचार का,
और प्रेम का गुंजन।
उस जगह बैठ
किसी उलझन को सुलझाऊँ।
भीतर का ज्ञान हो महान,
समझ केवल इतनी-सी कि
समझ आए केवल ध्यान।
ध्यान कुछ ऐसा लगे, मानो
किसी उलझन को सुलझाऊँ।
- गजेन्द्र
Nice